तकाजा है...
कुसूर मेरा नहीं है कुछ यारों ,
इलज़ाम लगाना ही है तो मौसम पे लगा ,
ये तो बस इस कातिल बहार का तकाजा है...
ना देख यूँ सर्द आखों से हमको जालिम ,
निगाहों से उनकी पिने को जी जो गर चाहे तो ,
ये भी बस उसी खुमार का तकाजा है...
इंतज़ार में अंधी हुई यादें भी अब तेरी ऐसे ,
सब्र भी साथ सा छोड़े चले जाता है ,
ये शायद बस उनके इक दीदार का तकाजा है...
हाथ में जाम है यार के नाम का ,
होठों पे नाम भी आते-आते लौट जाता है ,
ये भी इकरार का ही तो तकाजा है...
जाने क्यूँ एक बेवफा का ऐतबार आज भी है ,
इस खालीपन में कुछ चीखें अब भी बाकी हैं ,
ये "विनीत" तेरे ही उस प्यार का तकाजा है...
P.S : Pic clicked by Sourabh Sabharwal...
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