जगह नहीं है और डायरी में, ये ऐशट्रे पूरी भर गयी है... भरी हुई है जले-बुझे अधकहे ख़यालों की राखो-बू से, ख़याल पूरी तरह से जो के जले नहीं थे... मसल दिया था-दबा दिया था, पर बुझे नहीं वो, कुछ उनके टुर्रे पड़े हुए हैं... बस एक-दो कश ही ले के कुछ मिसरे रह गए थे, कुछ ऐसी नज़्में जो तोड़ कर फेंक दी थीं उसमें, धुआँ न निकले... कुछ ऐसे अश-आर जो मेरे "ब्रैंड" के नहीं थे, वो एक ही कश में खांसकर, ऐशट्रे में -- घिस के बुझा दिए थे... इस ऐशट्रे में, ब्लेड से काटी रात की नब्ज़ से टपकते सियाह क़तरे भी बुझे हुए हैं... इस ऐशट्रे में, हैं तीलियाँ कुछ कटे हुए नामों, नंबरों की.. जलाई थी चंद नज़्में जिन से... धुआँ अभी तक दियासलाई से झड रहा है, उलट-पुलट के तमाम सफ़्हों में झाँकता हूँ, कहीं कोई तुर्रा नज़्म का बच गया हो तो उसका कश लगा लूं... तलब लगी है !!! ये ऐशट्रे पूरी भर गयी है...