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Showing posts from August, 2015

वो जो शायर था...

वो जो शायर था, चुप सा रहता था बहकी बहकी सी बातें करता था आँखें कानो पे रख के सुनता था गूंगी खामोशियों की आवाज़ें... जमा करता था चाँद की गीली गीली से नूर की बूँदें, ओक मे भर के खडखड़ाता था रूखे रूखे से रात के पत्ते... वक़्त के इस घनेरे जंगल मे कच्चे पक्के से लम्हे चुनता था हाँ वोही, वो अजीब सा शायर रात को उठ के कोहनियों के बल चाँद की थुड्डी चूमा करता था.. चाँद से गिर के मर गया है वो लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है... : गुलज़ार

शायद...

मेरे आँसुओं को तेरे आँसुओं से, शिकवा भी है.. मोहब्बत भी है...  सुल्गकर दिल में जो नज़रों में पिघलता है,  गम जितना उधर है.. उतना शायद इदहर् भी है...