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Showing posts from March, 2011

कौन हो तुम

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आग, कभी-कभी रौशनी... कहीं-कहीं शोर, रौनकें... कहीं आग-आग, कहीं धुंआ-धुँआ, कभी आस-पास, कभी यहाँ-वहाँ, कभी शोर हो तुम, कभी मोअन हो तुम, कौन हो तुम... तुम्हे नाम दिया है मैंने एक, तुम्हे शकल दे रहा हूँ, दर्द से गहेरे, सोच से ऊँचे.. प्यार से उजले नक्श, तुम्हारे ज़हेन में मेरे... धुन्दले धुन्दले... कोई सच हो, या उलझा हुवा ख्याल हो तुम, कौन हो तुम... जिसकी तस्वीर निघाओं में, तस्वीर में देखे रंग कई... रंगों में मौसम बहार का, तेरी जीत का, मेरी हार का, इनकार का, इंतज़ार का, इकरार का, तकरार का, भीगा सा एक रंग ये भी है प्यार का... आग, कभी-कभी रौशनी... कहीं-कहीं शोर, रौनकें... P.S : Inspired from a song..

फितरत

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मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता, इस का मतलब ये नहीं की मैं तुझे से प्यार नहीं करता.. चाहता हूँ मैं तुझे आज भी पर, बस तेरी सोच में वक़्त अब अपना बर्बाद नहीं करता... तमाशा न बन जाये कहीं मुहब्बत मेरी, इस लिए बस अपने दर्द का इज़हार नहीं करता... जो कुछ मिला है उसी में खुश हूँ मैं अब, तेरे लिए खुदा से तकरार नहीं करता.. पर कोई तो बात है तेरी "फितरत" में ज़ालिम, वरना मैं तुझे चाहने की खता बार-बार नहीं करता...