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Showing posts from January, 2011

आँखें

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जब खुदा ने तुझे बनाया होगा, एक-आधा जाम तो उसने भी लगाया होगा... ऐसे ही नशीली नहीं हैं तेरी आँखें, जाम का कुछ तो असर तेरी आँखों में आया होगा… उन आँखों से जब तलक मैंने जाम नहीं पिया, ज़िन्दगी में तब तक किया तो क्या किया ?? नशीली कुछ ऐसी हैं तेरी आंखें, ये ज़हर पिए बिना मैं जिया भी तो क्या जिया ?? जब खुदा ने तुझे बनाया होगा, एक-आधा जाम तो उसने भी लगाया होगा... ऐसे ही नशीली नहीं हैं तेरी आँखें, जाम का कुछ तो असर तेरी आँखों में आया होगा…

इतिहास

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आये थे हम बेनाम शहरों से, कुछ जुटाने के लिए कुछ मिटाने के लिए... सोचा था जिंदगी सवर जाएगी अपनी भी, क्या पता था जिंदगी से अभी मुलाकात होनी बाकी है... आये थे हम भी तलाश में एक, कुछ सपने इन नादान आँखों में लिए... सोचा था हमे भी पनाह मिलेगी यहीं कहीं, क्या पता था गुमनामी से अभी मुलाकात होनी बाकी है... आये थे जिन कच्ची गलिओं से, पत्थर से मजबूत इरादे लिए... सोचा था पा लेंगे दुनिया सारी अब, क्या पता था दर-बदर की ठोखरें खाना बाकी है... आये थे तब कुछ अलग फ़साने थे, साथी कोई था नहीं साथ निभाने के लिए... सोचा था बनाते चलेंगे राह अपनी खुद, क्या पता था अभी दोराहों पर आना बाकी है... आये थे खाली दिल लिए हम यहाँ, यारों की यारी से इसे भरने के लिए... सोचा था साथ रहेगी दोस्ती अब हमारे, क्या पता था अभी मिलके जुदा होना बाकी है... आये बेशक थे खाली हाथ, अधूरी सी कहानी पूरी करने के लिए... सोचा नहीं था शयाही,पन्नो और पात्रों के बारे में, मजिल दूर है अभी यारों और इतिहास लिखना अभी बाकी है... आये थे हम बेनाम शहरों से, कुछ जुटाने के लिए कुछ मिटाने के लिए... सोचा था जिंदगी सवर जाएगी अ...

बचपन

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बचपन का ज़माना होता था, खुशिओं का खज़ाना होता था.. चाहत चाँद को पाने की, दिल तितलिओं का दीवाना होता था.. रोने की वजह न होती थी, हसने का बहाना होता था.. खबर न थी कुछ सुबहों की, न शामों का ठिकाना होता था.. दादी की कहानी होती थी, परिओं का फ़साना होता था.. पेड़ों की शाखें छूते थे, मिटटी का खिलौना होता था.. गम की जुबान न होती थी, न ज़ख्मों का पयमाना होता था.. बारिश में कागज़ की कश्ती, और हर मौसम सुहाना होता था.. मिटटी के आशियाने होते थे, कोई बेगाना नही,सभी तो अपने होते थे.. चलो फिरसे सागर पे रेत का मकान बनाये, शायद वापस अपना खोया बचपन मिल जाये.. बचपन का ज़माना होता था, खुशिओं का खज़ाना होता था.. चाहत चाँद को पाने की, दिल तितलिओं का दीवाना होता था..

कशमकश

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अजीब सा आलम छाया है, अजीब सी खामोशी भी है.. खामोश है हम भी यहाँ, चुप से हो तुम भी वहां.. समझाकर भी देख लिया मैंने दिल को, बहलाकर भी देख लिया मैंने दिल को.. इस दिल-ओ-दिमाग की जंग में.. जीत अब नज़र नहीं आरही है मुझे, पर हारना है इस जंग में मुझहेको.. जिस ख्याल को ख्यालों से जुदा करना चाहता हूँ मैं, जिन जज्बातों को बहने देना चाहता नहीं हूँ मैं, कशमकश कुछ ऐसी है दिल की बातों की अब.. सच को सच मानने को जी नहीं करता, खवाबों की झूटी दुनिया से निकलने को जी नही करता.. वो कहती है जिंदगी के शीशे पर, सचाई की धुंध जब छा जाये... तब भरोसे के पल्लू को थम कर, एक बार कोशिश करो फिर एकबार सपने देखे की... मुस्कुराता हूँ सब बातें सुनकर अब उसकी, बातें तो हम भी बहुत किया करते हैं... खुदा न समझो हमे तुम, इन्सान ही हैं ,इंसानों की तरह जिया करते हैं... दिल के किसी गुमसुम से कोने में , परछाई तुम्हारी अब भी बाकी है.. कोशिश बहुत करता हूँ अंधेरों में उसे गुम करने की, पर हातों में उसके अब भी थोड़ी सी शमा बाकी है.. अजीब सा आलम छाया है, अजीब सी खामोशी भी है.. खामोश है हम भी यहाँ, चुप से ...