शायद तुम...
मैं तुझ में कुछ अपना देखता था, जो शायद तुम देख नहीं पाए... मैं तुझ में कुछ अपना सोचता था, जो शायद तुम सोच नहीं पाए... वादे भी किये थे बहुत से तुमने, जो शायद तुम निभा नहीं पाए... कुछ अधूरे सपने भी देखे थे मैंने, जो शायद तुम देख नहीं पाए... धडकनों से वाकिफ कराने की कोशिश भी की, जो शायद तुम सुन नहीं पाए... कुछ तो बात होगी हमारे अंदाज़-ए-वफ़ा में, जो शायद तुम भी भुला नहीं पाए... मैं तुझ में कुछ अपना देखता था, जो शायद तुम देख नहीं पाए... मैं तुझ में कुछ अपना सोचता था, जो शायद तुम सोच नहीं पाए...