दिनचर्या
" !@#$$%&, आज फिर आँखें बंद करते ही सुब्ह हो गयी !!! " अगर आप भी हफ्ते के पहले पांच दिनों की शुरुआत कुछ ऐसे ही करते हैं तो मैं बेहिचक कह सकता हूँ की आप भी किसी देसी या विदेसी कंपनी को अपने दिन के एक-तिहाई घंटे उपहार में देते हैं.आज का थोड़ी,ये तो रोज़ ही का हाल है. हम तो सुब्ह उठकर किसी प्रकार की कसरत करने की हालत में होते नहीं हैं पर हर रोज़ कायदे से 4 गाली देकर,कम से कम उस थके से अलार्म की वर्जिश जरुर करा देते हैं. किसी तरह आँखें मलते हुए सुबह के सारे क्रिया-कलाप समाप्त करके हम अब अपने उड़न-खटोले पे सवार हुए निकल चलते हैं अपनी "बिल्लो" से मिलने. अब हमारा तो बचपन से एक सीधा सा उसूल रहा है, जहाँ दिल न लगे वहां दिल लगाने के बहाने ढूंढ़ लीजिये तो जिंदगी थोड़ी सी आसान हो जाती है. अनन्या aka बिल्लो हमारा रोज़ घर से 15 km दूर कंपनी जाने का बहाना ही तो है. अरे हमे छोड़िए, हमारे ही floor के न जाने कितने दिलजले आशिक उसकी उन बिलोरी आँखों के पीछे देश-दुनिया परायी करे...