कशमकश

अजीब सा आलम छाया है,
अजीब सी खामोशी भी है..
खामोश है हम भी यहाँ,
चुप से हो तुम भी वहां..

समझाकर भी देख लिया मैंने दिल को,
बहलाकर भी देख लिया मैंने दिल को..
इस दिल-ओ-दिमाग की जंग में..
जीत अब नज़र नहीं आरही है मुझे,
पर हारना है इस जंग में मुझहेको..

जिस ख्याल को ख्यालों से जुदा करना चाहता हूँ मैं,
जिन जज्बातों को बहने देना चाहता नहीं हूँ मैं,
कशमकश कुछ ऐसी है दिल की बातों की अब..
सच को सच मानने को जी नहीं करता,
खवाबों की झूटी दुनिया से निकलने को जी नही करता..

वो कहती है जिंदगी के शीशे पर,
सचाई की धुंध जब छा जाये...
तब भरोसे के पल्लू को थम कर,
एक बार कोशिश करो फिर एकबार सपने देखे की...

मुस्कुराता हूँ सब बातें सुनकर अब उसकी,
बातें तो हम भी बहुत किया करते हैं...
खुदा न समझो हमे तुम,
इन्सान ही हैं ,इंसानों की तरह जिया करते हैं...

दिल के किसी गुमसुम से कोने में ,
परछाई तुम्हारी अब भी बाकी है..
कोशिश बहुत करता हूँ अंधेरों में उसे गुम करने की,
पर हातों में उसके अब भी थोड़ी सी शमा बाकी है..

अजीब सा आलम छाया है,
अजीब सी खामोशी भी है..
खामोश है हम भी यहाँ,
चुप से हो तुम भी वहां..


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