करूँ तो क्या करूँ ?

मुक़दर से कब तक टकराया जाये अब ,
उसकी भी तो हसीयत कहाँ रही ...
करूँ तो क्या करूँ ? 

तकदीर को बस गले लगाया जाये अब ,
उसमे भी अब तब्दीलियाँ कहाँ रही ...
करूँ तो क्या करूँ ?

इतेफाकों की भी गुंजाइश ख़तम अब ,
सबब में भी समझ कहाँ रही ...
करूँ तो क्या करूँ ?

उमीदों की भी आस ख़तम अब ,
हसरतों में अब वो हंसी कहाँ रही ...
करूँ तो क्या करूँ ?

दुआओं की भी जरुरत किसे अब ,
खुदाई में उसकी अब वो रजा कहाँ रही ...
करूँ तो क्या करूँ ?

ऐतबार करें तो करें किसका अब ,
आंसुओं में भी मेरे अब वो नमी कहाँ रही ...
करूँ तो क्या करूँ ?

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