दिनचर्या
" !@#$$%&, आज फिर आँखें बंद करते ही सुब्ह हो गयी !!! "
अगर आप भी हफ्ते के पहले पांच दिनों की शुरुआत कुछ ऐसे ही करते हैं तो मैं बेहिचक कह सकता हूँ की आप भी किसी देसी या विदेसी कंपनी को अपने दिन के एक-तिहाई घंटे उपहार में देते हैं.आज का थोड़ी,ये तो रोज़ ही का हाल है. हम तो सुब्ह उठकर किसी प्रकार की कसरत करने की हालत में होते नहीं हैं पर हर रोज़ कायदे से 4 गाली देकर,कम से कम उस थके से अलार्म की वर्जिश जरुर करा देते हैं.
किसी तरह आँखें मलते हुए सुबह के सारे क्रिया-कलाप समाप्त करके हम अब अपने उड़न-खटोले पे सवार हुए निकल चलते हैं अपनी "बिल्लो" से मिलने. अब हमारा तो बचपन से एक सीधा सा उसूल रहा है, जहाँ दिल न लगे वहां दिल लगाने के बहाने ढूंढ़ लीजिये तो जिंदगी थोड़ी सी आसान हो जाती है. अनन्या aka बिल्लो हमारा रोज़ घर से 15 km दूर कंपनी जाने का बहाना ही तो है. अरे हमे छोड़िए, हमारे ही floor के न जाने कितने दिलजले आशिक उसकी उन बिलोरी आँखों के पीछे देश-दुनिया परायी करे बैठे हैं.
आधी नींद में कब मजाक ही मजाक में रास्ता कट जाता है पता ही नहीं चलता. मद्धम कदमो के साथ,चेहरे पे हलकी सी हंसी लिए हम चुप-चाप फिर उस्सी कुर्सी पे circus लगा लेते हैं. थोडा सा ध्यान देंगे तो आप ये तो जरुर जान जायेंगे की कंपनी कोई भी हो, उपरी देख-दिखावा छोड़ दें तो अन्दर वही फर्जीबाड़ा मिलेगा. चाहे वो आपकी शकल ताड़ती computer screen हों, या 60 साल की बुड्ढी हड्डियों की तरह कडकडाते हुए keyboard, या वो टीम लीडर जो दिन भर floor पे ऐसे घूमते हुए नज़र आयेंगे जैसे दिवाली के rocket को किसी ने हाथ ही में ले कर उड़ा दिया हो.
फिलहाल अगर मैं सिर्फ हमारे floor की बात करूँ तो यहाँ भी मनुष्यों की कई प्रकार की प्रजातियाँ पाई जाती हैं. जिन्हें हम मोटे तौर पर 3 श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं. हाँ,इससे पहले की आपको इनके बारे में विस्तार में बताऊँ ये जान लें की तीनो\ में से खुश कोई नहीं है. पहली श्रेणी में वो लोग आते हैं जिन्होंने अपनी मर्जी से "मोरी" में सर दिया है. या फिर ये कह लीजिये की दूर के सुहाने ढोल सुनके वो पडोसी की बारात में नाचने तो आये थे पर उन्हें ये नहीं मालूम था की दुल्हे की घोड़ी उनसे ही खफा हो जाएगी. साफ़ लब्जों में कहूँ तो ये वो हैं जिन्हें जिस तरह का काम चाहिए था वो मिल तो जरुर गया, पर जब यहाँ आना हुआ तो पता चला की दुनिया उतनी सीधि नहीं है जितनी इन्हें लगता था. इन्हें आप कंपनी के बंधवा मजदुर भी कह सकते हैं. अब 2 लोगों का काम अकेला कोई करके देदे,वो भी एक की तन्काह में तो उसे आप और क्या कहेंगे? दूसरी श्रेणी की तरफ गौर फ़रमाया जाये तो इनका वर्णन मात्र एक शब्द में किया जा सकता है - कामचोर. इन्हें तो बस महीने के 20 हजार से मतलब है चाहे इनसे ऑफिस में रोज़ गजरा लागवाके मुजरा करवालिजिये. ऐसा नहीं है की इन्हें कुछ आता न हो. ऑफिस देर से आने के बहाने ले लो, या ऑफिस से जल्दी घर जाने के, छुट्टी लेने के बहाने, या दिए हुए काम से पीछा छुडाने के. अगर कहीं ये सब बहाने कोई खरीदने लगे तो जादा नहीं सिर्फ 2 दिनों में लखपति बन जायें ये सब के सब. और आखिर में आती है तीसरी और अंतिम श्रेणी-युवतियां. इनके बारे में कुछ ख़ास जानकारी नहीं है इसलिए इनको सीधे-सीधे एक कोने में कर दिया जाये तो बहतर है.
(NO OFFENSE.. :P)
"चल बे बहुत हो गया टाइमपास, चल टाइम हो गया !! " घडी में 11:30 हुए नहीं की ये महाशय मेरे सर पे खड़े हो जाते है. वैसे हमारे समीर साहब उपर बताई गयी सारी श्रेणियों से परे हैं. ये न तो अपनी ख़ुशी से यहाँ हैं और न ही इन्हें पैसों का कोई लोभ है. कभी कबार तो मुझे लगता है की घर पे तो धुम्रपान किया जा नहीं सकता, तो ये यहाँ सिर्फ अपनी तलब मिटने आते हैं. हाँ पर एक बात है की बाकियों की तरह इन्हें भी अपनी ज़िन्दग इसे कुछ गिले शिकवा जरुर हैं. इंसानी तक्लिफ्फों की बात करूँ तो इस सूचि का कोई चोर मुझे तो नजर नहीं आता. किसी को तकलीफ होती है की उन्हें अछी नौकरी नहीं मिल रही है, और किसी को इस बात का तकलुफ़ है की दूसरों को उससे बहतर नौकरी कैसे मिल गयी? किसी को तकलीफ होती है की उनकी कोई प्रेमिका नहीं है, और किसी को की एक से गुजरा कैसे चलाया जाये. कोई इस बात से परेशान होता है की महीने भर का खर्चा नहीं निकल पा रहा, और कोई उतने ही पैसे एक ही दिन में उड़ाके कह देता है की - " क्या यार, आज मजा नहीं आया !!!" बेहरहाल, हम भी कभी कबार धुम्प्रपन कर लिया करते हैं. पर ऐसा नहीं की छोडना नहीं चाहते. पिछले 1 साल में कम से कम\ 4-5 बार तो हम ये नाकाम कोशिश कर ही चुके होंगे. सच पूछें तो सिग्रेट बस शुरू ही होती है. बेशक आप कम करदें पर पूरी तरह छोड़ने के लिए जिस अताम्सैयम की जरुरत है वो सब में कहाँ होता है. लीजिये, पहुच गए हम भी smoking zone. पहुचते ही कई मुस्कुराते हुए चहरे आपका स्वागत करेंगे. और कुछ हो न हो, धुम्रपान aka सुत्तेबाज़ी और मदिरापान aka दारुबाज़ी को हम universal socialising agent या सर्वभोमिक सामाजिक एजेंट जरुर कह सकते हैं. सच मानिये जितने दोस्त आपने अपने स्कूल या कॉलेज के पहले दिन बनाये होंगे उससे जादा दोस्त आप किसी भी smoking zone में 2 घंटो में बना लेंगे वो भी सिर्फ एक lighter की मदद से. अब हम बात करतें है दिन के पहले सुट्टे की. जैसा एक रोज़ समीर कह रहा था की - " दिन का पहला सुट्टा दिल-ओ-दिमाग को वो सुकून देता है, जैसे हमे अपना गुम\हुआ पैसों से भरा बटुआ वापस मिल गया हो. उसके बाद तो दिन भर बस धुआ-धुआ ही होता है. दिन के पहले सुट्टे में जो बात है वो किसी और में नहीं." पर हमारी बेचैन नज़रें तो किसी और ही की तलाश कर रही थी. पता नहीं आज हमारी बिल्लो रानी कहाँ रह गयी. होने को तो कुछ भी हो सकता है पर फिर भी क्या पता लेट ही हो गयी हो. भारी सी आवाज़ में मैंने समीर से\ कहा की- " चल उपर चलते हैं, बहुत काम है यार. "
कई बार ऐसा होता है की जो आप सोचते हैं वो सच हो जाता है. चाहे वो teacher का क्लास में देर से आना हो या रेडियो पे आनेवाला अगला गाना. जो भी हो मेरा तो दिन बन गया था. सामने से अनन्या जो चली आ रही थी. ऐसा लगा जैसे अचानक मेरा सीना 2 इंच छोड़ा और कद 1 इंच बढ़ गया हो. जैसे आँखों में चमक और चहरे पे तेज आ गया हो. यकायक तापमान भी मानो 5 डिग्री कम हो गया हो. हवा थोड़ी और महनत करने लगी हो. अब महज 3-4 कदमो का फांसला ही रह गया था और मैं तरस रहा था की कब उनकी नजरें और हमारी निगाहें टकराएंगी. "aaaaah !!" धीरे से उसका पलकों को उठाना और चुपके से मुस्कुरा देना. वक़्त मानो थम सा जाता है. " साले , बहुत हुआ तेरा ये रोज़ का नाटक... कभी बात भी कर.. वरना पता चला मेरे जैसा कोई कमीना निकाल ले गया.." समीर ने कंधे पे हाथ रखते हुए थोड़ी ऊँची आवाज़ में कहा और पीछे मुड़कर जाँच पड़ताल की, कि जहाँ तक बात पहुचनी चाहिए थी वहा कोई हलचल हुई कि नहीं. हडबडाहट में मैंने अपने कदमो के घोड़ों पे चाबुक बरसाए और तुरंत से पहले वहा से गायब हो गया. ये बात और है कि अन्दर ही अन्दर मैं भी सोच रहा था कि उसने सुना कि नहीं? अगर सुना तो उसकी क्या प्रतिक्रिया रही? इन्ही सब सवालों में गुम मैं फिर अपनी अंधेर नगरी पहुच गया.
सामने computer screen पे कुछ पेचीदा software गाने गा रहे थे , पर दिमाग में अभी भी मैं उसी हंसी को loop में play करने में लगा था. समीर हो या कोई और, सब यही कहते हैं कि-भाई जान बात आगे तो बढाओ. पर आप इस बात से मुह्ह नहीं मोड़ सकते कि जो अनिश्चिता किसी को अपने दिल की कहानी बयां करने से पहले रहती है उसका रोमांच कुछ अलग ही होता है. और एक बार जो आपने अपने दिल का हाल बयां कर दिया तो हो सकता है की वहा से कोई सकारात्मक जवाब न आये. तब क्या होगा? और अगर बात बन गयी, तब क्या करेंगे? दोनों ही सूरतों में जो हम अभी अनुभव कर रहे है, ये अनुभूति तो हवा हो जाएगी न. इतना ही नहीं, अगर "न" हो गयी तो दारू और सुट्टे के मासिक budget में इजाफा होना लाजमी है. और अगर गलती से "हाँ" हो गयी तो पेट्रोल और movies का मासिक budget डामा-डोल हो जायेगा. इसको अगर छोड़ भी दें तो "प्रेमिका पालन" जैसा की मेरा एक ख़ास मित्र कहता है ,बचोन का खेल नहीं है. "तुम सुट्टा छोड़ क्यों नहीं देते?" -क्यूंकि मैं छोडना नहीं चाहता. "तुम दारू कम क्यों नहीं करते?"-अरे मैडम जी, मेरे पिता श्री भी यही कहते हैं, उनकी तो सुनते नहीं तुम्हारी कैसे सुन लें फिर भला. " तुम्हारे दोस्तों की वजह से तुम इन सब चक्रों में पड़े हो" -haaaaah,ये भी तो हो सकता है वो मेरी वजह से इन चक्रों में पड़े हों?? "तुमने सुबह मुझे फोन करके gud morning नहीं कहा !"-अरे मैडम जी, यहाँ खुद की gud morning 12 बजे हुई थी. और भी न जाने क्या-क्या. ऐसा नही है की सभी प्रश्न गलत हों या ऐसे हों जिन पे अमल न किया जा सकता हो, पर पाँचों उँगलियाँ एक जैसी नहीं होती हैं न. सबके जिंदगी जीने के अलग-अलग funde हैं और उन fundon को fuddu कहोगे तो तकलीफ आप को ही होनी है. जबरदस्ती किसी बचे को खेल के मैदान से कान पकड़ कर घर पे बिठाके गीता सार दो दिन सुना भी लोगे तो तीसरे दिन वो फिर उसी मैदान की धुल खाता मिलेगा. इतनी सी बात समझते क्यों नहीं है लोग ?
"अबे ओ !!! आँखे खोल के सो गया क्या बे?? उठ चल लंच टाइम.." मेरी आँखों के आगे हाथ घुमाते हुए रोहित ने कहा. मैंने उसे देखा और दो-चार प्रवचन सुना डाले. रोहित है मेरा कॉलेज के दिनों का यार. साथ-साथ कॉलेज किया और अब भगवन की लीला देखो, दोनों एक ही कम्पनी में घिस रहे हैं. TL ने सुबह- सवेरे तबियत से बिचारे की क्लास ली थी. इसलिए उसकी माँ-बहन को तहे दिल से याद कर रहा था. हम तो खाना खा के भूक मिटा रहे थे, पर TL, उसकी दुलारी एकलौती माँ और दो सगी बहनों के साथ कुछ मुहबोली बहनों का पेट आज रोहित मियां यही से भरने में लगे थे. इसकी बकर सुनते-सुनते कब लंच ख़तम हुआ पता ही नहीं चला.
अब शुरू होता है दिन का सबसे थका हुआ हिस्सा. जब आप गले तक खाना ठूस के, सामान्य से 5 डिग्री कम वाले air conditioner की शरण ले लेते हैं. मुझे याद है कॉलेज के दिनों में जब भरी दोपहर में हम परदे तान के आखरी बेंच की शोभा बढाया करते थे. बस कुछ ऐसा ही समां यहाँ भी बन जाता है लंच के बाद. ऐसे में आप लोगों को एक दुसरे को देखकर जम्हाइया लेते देख सकते है. काम करने की रफ़्तार भी सामान्य से आधी हो जाती है और आँखें सिर्फ इसी आस में खुली रह पाती हैं की थोड़ी देर में दोपहर की चाय की चुस्कियां नसीब होनेवाली हैं. चाय की भीनी-भीनी खुशबु से आधों की नींद उड़ जाती है, और बाकियों तक खबर न जाने किन अज्ञात सूत्रों से पहुचती है. चाय का प्याला हाथ में लिए, एक तरफ युवतियों की टोली मार्केट में आये नए सुन्दरता वृधि उपकरणों के बारे में हंगामा करते मिल जाएँगी और दूसरी तरफ हम जैसे मुष्टंडे पिछले शनिवार की पार्टी की बोत्तालों की गिनती करते नज़र आयेंगे. वैसे सिर्फ यही विषय नहीं होते ऐसी बैठकों में. आनेवाली फिल्मो की कहानी से लेकर, आपकी पापी पड़ोसन तक सब चीज़ों पे विस्तार में चर्चा हमारे ऑफिस की काबिल युवतियां यही तो करती हैं. और हमारे नौ-जवान भी कहा पीछे रहनेवाले हैं. ये भी तो अपनी सोसाइटी की किसी आजाद पंची पे नज़र गडाए बैठे हैं, किसी को अपने seniors की "तारीफ" करने से फुर्सत नहीं है और कोई हमारी तरह एक कोने में खड़ा सिर्फ वार्तालाप का नाम मात्र हिस्सा बन जाता है.
चाय ख़तम हुई नहीं की लोगों की काम करने की शमता में जमीन-असमान का अंतर आया नहीं. अब सबको काम निपटा के घर जाने की जल्दी जो हो जाती है. 2 घंटे का काम जिसे पूरा करने में लोग पूरा दिन लगा देते हैं अब कुछ ख़तम होता नज़र आने लगता है. और ये बजे शाम के 6 और ये निकली जनता चिड़ियाघर से . वैसे एक बात तो है, दिनभर में चाहे कितना ही रोना-धोना हुआ हो पर घर जाने की बात सुनते ही चहरे पे जो ख़ुशी होती है लोगो की, उसको बयां करना मेरे बसकी बात नहीं. चाहे काम हुआ हो या न हो, चाहे "कल" हमें सूली पे लटकाया जानेवाला हो पर उस समय दिमाग में बस घर पहुचने का सबसे तेज और छोटा रास्ता ही दिमाग में घूमता है. ओरों की छोड़िए, हम भी वापसी के समय उड़ते हुए घर आते हैं. सच मानिये तो moto gp शाम को 6 बजे ऑफिस से घर के track पे करा दे कोई तो न जाने कितने नए देसी V.Rossi मिल जायेंगे आपको हर बड़ी कंपनी में.
किसी तरह जान बचा के जब घर पहुच भी जाते हैं तो इस सोच में पड़ जाते हैं की वापस तो आ गए अब करें क्या? थोडा सा दिमाग पे जोर डालते है तो याद आता है की घरवालों से बात करने का "काम" 2 दिनों से लंबित है. फिर फ़ोन घुमाया जाता है और आधे घंटे विस्तार से समझाया जाता है की मैं यहाँ अपने काम से कितना खुश हूँ. कैसे मैं महाराजाओं की तरह अपनी जिंदगी धीरे-धीरे खर्च रहा हूँ. किसी तरह उन्हें भी मेरी बातों से यकीन हो ही जाता है और एक बार फिर ख़ुशी-ख़ुशी अलविदा हो जाती है. अब तो हमने घर बात भी करली.
अब क्या करें ? घडी की तरफ नज़र दौड़ती है और पता लगता है की 8 बज रहे है. काम अब सिर्फ रात्रि भोजन का बाकी है और बजे सिर्फ 8 ही हैं . इसी सोच में अब एक सोच और जुड़ जाती है की आज खाना कहाँ खाया जाये. खाने का नाम लेते ही- " कहाँ और क्या ? " ये दो चीज़ें याद आ जाती हैं. चलो, आज chiken biryani हो जाये! ये सोच कर दिल में चंद लम्हों की ख़ुशी तो होती है, पर फिर पड़ोस के रसोईघर से तडके की आवाज़ और हलकी सी खुशबु आ जाती है और सारे भ्रम चूर हो जाते हैं.
रात्री भोज भी निपट गया, अब क्या? 9 ही तो बजे हैं. क्यों न कोई movie ही देख ली जाये. लैपटॉप on होता है और अछी सी movie की तलाश जारी हो जाती है. ये देखि हुई है, ये नहीं देखनी, ये bore है, ये अभी नहीं देखेंगे. ऐसा करते करते चलो आधा घंटा और निकल जाता है. चलो छोड़ो ये सब facebook नाम की चिड़िया कब काम आएगी. देखें जरा क्या चल रहा है देश-दुनिया में. जी हाँ, आज कल चाहे जापान में आई आपदा हो या मिश्रा जी के ख़राब पेट का हाल, सब की खबर आपको facebook पे मिल जाएगी. "और मेरे शेर !! अब तो बड़ा आदमी हो गया है.. प्रोजेक्ट पे भी डाल दिया अब तो.. एश ही एश है बेटा जी !!" pooook की आवाज़ के साथ ऐसे ही न जाने कितने बम गिरते है online आते ही. हाँ भाई बहुत बड़े तीर मार रहा हूँ मैं. लोग ऐसे बात करते है जैसे नौकरी नहीं पूरी की पूरी कंपनी दहेज़ में मिल गयी हो मुझे. " बस यार, महरबानी है आप सब की !!" अब बोले तो क्या बोले. इधर-उधर की 10 बातें करके सब वही आ जाते हैं -पैसा कितना मिल रहा है बे फिर ? और ऐसे ही समय में चुप करके logout कर जाया करता हूँ. अब क्या बोलूं इन्हें की काम में तो पूरी गाडी बनवा लेते हैं और पैसे के नाम पे सिर्फ tyre change का मोल लगाते हैं. पर काम तो करना ही है चाहे रो के कर लो, या ख़ुशी से. काम से भाग तो सकते नहीं अब. और बेशक कैसा भी काम हो उसके बारे में बुराई करनेवालों में से हम हैं नहीं.
किसी तरह अब सारे क्रिया-कलापों से छुटकारा पाकर हम सोने का मन बना ही लेते हैं. light बंद होती है और दिमाग के घोड़े न जाने कहाँ-कहाँ की घास खाने निकल जाते हैं. कभी कल ऑफिस में क्या काम है उसके बारे में सोचता हूँ, तो कभी आज दिन भर में आखिर क्या किया मैंने उस तरफ ध्यान जाता है. बड़े बुजुर्ग कह गए थे की - ' हर बड़े आदमी के पीछे, उसके उससे भी बड़े सपने होते हैं '. अब उन्हें कैसे समझाउं की यहाँ तो सपने देखने का भी वक़्त नहीं है. सोमवार से गुरुवार की रातें "आज-कल और परसों" के ख्यालों में गुजर जाती हैं, शुकर और शनिचर दारू चढाने और उतारने में लापता हो जाती हैं, बची रविवार की रात वो इसी सोच में निपट जाती है की कल वापस ऑफिस जाना है. पर रोज़ मैं सोने से पहले एक बार तो ये जरुर सोचता हूँ की, मैं क्या कर रहा हूँ अपनी जिंदगी के साथ? ये सवाल जरुर परेशान करता है की क्या मैंने जो सोचा था मैं वही कर रहा हूँ? अगर "हाँ" तो मैं खुश क्यों नहीं हूँ? और अगर "न" तो आखिर गलती कहा हो गयी. जवाब चाहे कुछ भी हो पर अलार्म की सुइयों की आवाज़ सुनते-सुनते, आखिर में यही सोचते हुए नींद आ जाती है की -
"@#@%@$@, अभी आँखें बंद करूँगा और सुबह हो जाएगी !!!"

AWESOME :D :D :D
ReplyDeleteimpossible to write all the BEST lines, cause i wud then end up reposting the blog.
this is what we all expect, dont anticipate, and finally face... :P :D
AWESOME...
filhaal toh hum kisi MNC mein bandhwa majdoor nahin hain... par aapki jitni taareef ki jaye kam hai... Bada Rocking item likha hai aapne... :D
ReplyDeletearey bhai... jo bhi hum jaisa londa padega yhi kehta nazar aayega--"bhai toone toh meri dincharya likh di yaar.."...
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