बात

पीते हैं हम शराब ग़म-ए-तन्हाई में,
तेरी आँखों से पीते तो कोई और बात थी...

जाते हो क्यों मैक़दे तुम, पूछती है वोह,
तू रोज़ दरीचे पे आती तो कोई और बात थी...

खुदा के घर को निलकता हूँ में बेरज़ा,
तू खुदा-साज़ होती तो कोई और बात थी...

सोचता हूँ किसी और का हो जाऊं मगर,
तू बेवफा ही होती तो कोई और बात थी...

कट तो रही है ज़िन्दगी तुझसे जुदा होकर,
तू दिल से जुदा हो पाती तो कोई और बात थी...

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