जीने की आदत
जीने की आदत पड़ गयी है
जीवन को जीने की ऐसी आदत में
बरसात के दिन हैं यदि
तो जीने की आदत में
बरसात हो रही होती है
छाता भूल गया तो
जीवन जीने की आदत में
छाता भूल जाता हूँ
और भींग जाता हूँ
जब बिजली कौंध जाती है
तब बिजली कौंध जाती है
आदतन जीना, उठना, बैठना, काम करना
थोड़े थोड़े भविष्य से ढेर सारे अतीत इकट्ठा करना
बचा हुवा तब भी ढेर सारा भविष्य होता है
ऐसे में ईश्वर है कि नहीं की शंका में कहता हूँ मुझे अच्छा मनुष्य बना दो
और सबको सुखी कर दो
तदानुसार अपनी कोशिश में पता नहीं कहाँ से आदत से अधिक दुः ख की बाढ़ आती है
जैसे पड़ोस में ही दुःख का बांध टूटा हो
और सुख का जो एक तिनका नहीं डूबता
दुःख से भरे चेहरे के भाव में
मुस्कुराहट सा तैर जाता है
न मुझे डूबने देता है, न पड़ोस को
और जब बिजली कौंध जाती है
तब बिजली कौंध जाती है
अंधेरे में बिजली कौंध जाने के उजाले में
सम्हलकर एक कदम आगे रख देता हूँ
जीवन जीने की ऐसी आदत में
जब मैं मर जाऊँगा
तो कोई कहेगा शायद मैं मरा नहीं
तब भी मैं मरा रहूँगा
बरसात हो रही होगी
तो जीवन जीने की आदत में
बरसात हो रही होगी
और मैं मरने के बाद
जीवन जीने की आदत में
अपना छाता भूल जाऊँगा
: विनोद कुमार शुकल (1st Jan 1937 - 23rd Dec 2025)
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