मुलाकात...

" अरे... कहाँ गायब थे इतने दीनो से ? ", ऐसा ही कुछ पूछ लिया उसने उस रोज़. क्या करें ? मेरे ख़यालों के किसी कोने में छुपी हुई तन्हाई भी आज कल याद नही आती है. मगर बिना दस्तक दिए किसी पुराने दोस्त की तरह वो भी बे धड़क घुस आई मेरे जहन के मैखाने में. 
" भूले नही हैं तुम्हे, बस यादाश्त ज़रा कमजोर रहने लगी है दुनिया के दस्तूर याद रखते रखते.. ", ये कहकर मुस्कुरा दिया मैं भी. एक वक़्त था जब हम ही दोनो तो शाम ढलते ढलते कई नयी-पुरानी बातें एक दूसरे के कानों में फुसला दिया करते थे. फिर कुछ पहेलियों को रात गुजरने से पहले सूरज क नाम लिखा जाता था. मगर अब क्यूँ नही हो पता कुछ ऐसा? यही सोचते-सोचते मेरी हँसी उसकी आँखों की तरह खामोश हो गयी.
" अच्छा इतना तो बता दो आज कल बात क्यूँ नही करते हमसे ?  " उसके पूछने से पहले ही मुझे मालूम था की अब वो ऐसी ही बात करेगी. सारे ख़यालात और उन खायालातों से वाकिफ्फ होने वाले लोगों की ये भी एक दिक्कत ही तो है. " अब लगने लगा है की तुम अपना ख़याल खुद रख सकती हो. हमारी बातें तो अब हम खुद नही सुना करते. तुम सुनकर क्या करोगी ? " ऐसा लगा बोलकर जैसे कई दीनो से बस उससे ही बात करनी थी. मगर तन्हाई की फ़ितरत भी तो मोहब्बत जैसी ही है, आती है नींद की तरह और बुरे सपने की तरह जाते-जाते जगा जाती है.
एक के बाद एक पुरानी यादों के काई जाम टकराए उसके बाद. और इस बार पूछने की बारी मेरी थी - " बुरा लग रहा है तुम्हे या खुश हो की मैं याद नही करता ? " सुनकर एक बार तो कुछ सोच में पड़ गयी थी वो मगर फिर एकाएक बोल पड़ी, " मुझे सिर्फ़ बुरे वक़्त में ही तो याद किया था तुमने शायद इसलिए आज ये पूछते हो. " बात भी सही थी उसकी. हमारी पहली मुलाकात कुछ तंग से हालातो में ही तो हुई थी. जब कहने के लिए मेरे पास बहुत कुछ था मगर सुनने के लिए किसिके पास वक़्त नही हुआ करता था. तब यही तो थी एक जो बिना कुछ बोले मेरी हर बात समझ लिया करती थी. फिर ऐसा क्या हुआ की मैने आवाज़ नही लगाई ? 
" क्यूँ ? तुम्हे कैसे पता की आज सब कुशल-मंगल है यहाँ? ", मौका देखते ही मैने पूछ लिया चुपके से. " हमारी पहली मुलाकात क वक़्त मुझे कहाँ पता था की तुम तन्हाई हो ? वो तो जाते जाते मोहब्बत तुम्हारा पता बता गयी थी. कहा था अब वफ़ा की गलियों में आने की ज़रूरत नही है. उससे पहले वाले मजबूरी के चौराहे से बायें मुड़ोगे तो मायूसी का घर पड़ेगा. उसके साथ का पक्का मकान है तुम्हारा. " ये सुनकर उसके चहरे पर अजीब से हँसी आ गयी. " मतलब हमारी दोस्ती की वजह भी वो मोहब्बत ही निकली? अब बताओ बेवफ़ाई के बाद भी उसकी बातों पे यकीन कैसे कर लिया तुमने भला ? ", मद्धम आवाज़ में जवाब दिया उसने भी.
कहना तो बहुत कुछ चाहता था मैं इसके जवाब में मगर शायद अब इन सवाल-जवाबों, बेवजह और फ़िजुउल के हिसाबों, ग़लत या सही की कशमकश और खुद को समझते और समझाने के इस खेल से मैं थक सा गया हूँ. इसलिए मोहब्बत के नाम का आखरी जाम मैने होंठों से लगाया और तन्हाई को ये कहकर रुक्सत कर दिया की-
" शायद इसी सवाल का जवाब तुमसे पूछने आया था उस रोज़ मैं. "

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