वो जो शायर था...

वो जो शायर था, चुप सा रहता था
बहकी बहकी सी बातें करता था
आँखें कानो पे रख के सुनता था
गूंगी खामोशियों की आवाज़ें...

जमा करता था चाँद की
गीली गीली से नूर की बूँदें,
ओक मे भर के खडखड़ाता था
रूखे रूखे से रात के पत्ते...

वक़्त के इस घनेरे जंगल मे
कच्चे पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वोही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की थुड्डी चूमा करता था..

चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है...

: गुलज़ार

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