कुछ देर...

दर्द कुछ देर ही रहता है, बहुत देर नहीं...

जिस तरह शाख से तोड़े हुए एक पत्ते का रंग मांद पड़ जाता है,
कुछ रोज़ अलग शाख से रहकर...
शाख से टूट कर ये दर्द जीएग कब तक ? 
खत्म हो जाएगी जब इसकी रसद, 
टीम-टिमायेगा ज़रा देर को बुझते-बुझते... 
और फिर लम्बी सी एक साँस धुएं की लेकर,
खत्म हो जायेगा, ये दर्द भी...
बुझ जायेगा..! 

क्यूंकि दर्द कुछ देर ही रहता है, बहुत देर नहीं... 


: गुलज़ार 

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