मुसाफिर...

जाने किसकी तलाश उनकी आँखों में थी,
आरज़ू के मुसाफिर भटकते रहे...

जितने भी वो चले,
उतने ही बिछ गए राह में फासले...
ख्वाब मंजिल और मंजिलें ख्वाब थी,
रास्तों से निकलते रहे रास्ते...
नाजाने किस वास्ते ???

आरज़ू के मुसाफिर भटकते रहे,
जाने किसकी तलाश उनकी आँखों में थी...

:जावेद अख्तर साहब


 Pic : Lavasa, 22nd Oct 2010



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