दिल आखिर तू क्यूँ रोता है

जो चाहा था वो कब मिला है
जो सोचा था वो कब ढला है
जो है, वो नसीब ही है अब
जो होगा वो किसने देखा है
अनगिनत सपने देखे है
जाने कब आँखें खुल जाये...
क्यूँ तू इन खवाबों में जीता है ?
दिल आखिर तू क्यूँ रोता है...

जब-जब दर्द की बदली छाए
जब गम के साये यूँ लहराए
जब आंसू पलकों तक भी आए
जब ये तनहा दिल, कुछ घबराये
मन दिल की दीवारों से टकराए
वास्तविकता हमे कुछ यूँ समझाए...
क्यूँ तू इन उदासियों में खोता है ?
दिल आखिर तू क्यूँ रोता है...

ये जो गहरे सन्नाटे हैं
वक़्त ने सबको ही बांटे हैं
थोडा गम है सबका किस्सा
थोड़ी धुप है सबका हिस्सा
आँख तेरी बेकार ही नम है
हर पल एक नया मौसम है...
क्यूँ तू ऐसे पल खोता है ?
दिल आखिर तू क्यूँ रोता है...


P.S: Inspired from a poem by Mr.Javed Akhtar

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